1 . प्राचीन भारत में शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य और आदर्श क्या थे? वे हमारे देश की वर्तमान शिक्षा के लिए कहाँ तक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं?
प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व की श्रेष्ठ शिक्षा प्रणालियों में मानी जाती थी। उस समय शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, बल्कि व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास करना था। शिक्षा के माध्यम से मानव को आदर्श नागरिक एवं उत्तम चरित्र वाला व्यक्ति बनाने का प्रयास किया जाता था।
प्राचीन भारतीय शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य चरित्र निर्माण था। विद्यार्थियों में सत्य, अहिंसा, अनुशासन, सेवा तथा सदाचार जैसे गुणों का विकास किया जाता था। गुरुकुल प्रणाली में विद्यार्थी गुरु के सान्निध्य में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे, जिससे उनमें सम्मान, आज्ञाकारिता तथा आत्मसंयम की भावना उत्पन्न होती थी। शिक्षा का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य आत्मनिर्भरता था। विद्यार्थियों को श्रम का महत्व समझाया जाता था तथा उन्हें जीवनोपयोगी कार्यों का प्रशिक्षण भी दिया जाता था।
आध्यात्मिक विकास भी प्राचीन शिक्षा का एक मुख्य आदर्श था। शिक्षा के माध्यम से आत्मज्ञान तथा मोक्ष प्राप्ति पर बल दिया जाता था। वेद, उपनिषद, दर्शन, गणित, चिकित्सा तथा खगोल विज्ञान जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता था। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा तथा संस्कृत थी, जिससे विद्यार्थी ज्ञान को सरलता से समझ पाते थे।
प्राचीन शिक्षा में समाज सेवा और राष्ट्रहित की भावना को भी अत्यधिक महत्व दिया जाता था। विद्यार्थी अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करें, यह शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य था। इसके अतिरिक्त शिक्षा प्रकृति के निकट तथा सरल जीवन पर आधारित थी, जिससे विद्यार्थियों में संतुलित व्यक्तित्व का विकास होता था।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में प्राचीन भारतीय शिक्षा के आदर्श अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। आज शिक्षा अधिक परीक्षा एवं रोजगार केंद्रित हो गई है, जिसके कारण नैतिक मूल्यों में गिरावट दिखाई देती है। यदि शिक्षा में चरित्र निर्माण तथा नैतिक शिक्षा को पुनः महत्व दिया जाए, तो विद्यार्थियों में अनुशासन, जिम्मेदारी तथा मानवीय गुणों का विकास हो सकता है।
इसी प्रकार आत्मनिर्भरता, श्रम की गरिमा तथा व्यावहारिक शिक्षा के सिद्धांत आज भी अत्यंत आवश्यक हैं। योग, ध्यान तथा भारतीय संस्कृति का समावेश विद्यार्थियों के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक हो सकता है। गुरु-शिष्य संबंधों में भी पहले जैसी आत्मीयता और सम्मान की आवश्यकता है।
अंततः कहा जा सकता है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा के उद्देश्य और आदर्श वर्तमान शिक्षा को अधिक नैतिक, व्यावहारिक तथा समाजोपयोगी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आधुनिक शिक्षा में यदि प्राचीन मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समन्वय किया जाए, तो शिक्षा प्रणाली अधिक प्रभावी और उपयोगी बन सकती है।
OR
वैदिक शिक्षा प्रणाली तथा मुस्लिम शिक्षा प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
वैदिक शिक्षा प्रणाली और मुस्लिम शिक्षा प्रणाली भारतीय शिक्षा इतिहास की दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ हैं। दोनों प्रणालियों ने भारतीय समाज, संस्कृति तथा शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यद्यपि दोनों की प्रकृति, उद्देश्य तथा शिक्षण पद्धति अलग थीं, फिर भी दोनों में नैतिकता और ज्ञान को विशेष महत्व दिया गया।
वैदिक शिक्षा प्रणाली प्राचीन भारत की प्रमुख शिक्षा व्यवस्था थी। इसका मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करना था। इस शिक्षा प्रणाली में चरित्र निर्माण, नैतिकता, आत्मानुशासन तथा आध्यात्मिक उन्नति पर विशेष बल दिया जाता था। शिक्षा गुरुकुलों में दी जाती थी, जहाँ विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु और शिष्य के बीच अत्यंत घनिष्ठ तथा सम्मानपूर्ण संबंध होते थे।
वैदिक शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी। वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, गणित, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान तथा युद्ध-कला जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। शिक्षण विधि मुख्यतः श्रवण, मनन और चिंतन पर आधारित थी। शिक्षा निःशुल्क होती थी तथा विद्यार्थी सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धांत का पालन करते थे। इस शिक्षा प्रणाली में धार्मिक तथा नैतिक मूल्यों को अत्यधिक महत्व दिया जाता था।
इसके विपरीत मुस्लिम शिक्षा प्रणाली का विकास मध्यकाल में हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार तथा धार्मिक ज्ञान प्रदान करना था। शिक्षा मकतब और मदरसों में दी जाती थी। मकतब प्राथमिक शिक्षा के केंद्र थे, जबकि मदरसे उच्च शिक्षा प्रदान करते थे। इस शिक्षा प्रणाली में अरबी और फारसी भाषाओं को विशेष महत्व दिया जाता था।
मुस्लिम शिक्षा प्रणाली में कुरान, हदीस, इस्लामी कानून, दर्शन, इतिहास, साहित्य तथा गणित जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता था। शिक्षण पद्धति स्मरण शक्ति तथा व्याख्यान प्रणाली पर आधारित थी। विद्यार्थियों में अनुशासन, धार्मिक आस्था तथा नैतिकता का विकास करने पर बल दिया जाता था। मुस्लिम काल में पुस्तकालयों, साहित्य तथा कला के विकास को भी प्रोत्साहन मिला।
दोनों शिक्षा प्रणालियों में कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ थीं। दोनों में नैतिक शिक्षा तथा अनुशासन को महत्व दिया गया, किंतु वैदिक शिक्षा आध्यात्मिक एवं जीवनोपयोगी ज्ञान पर आधारित थी, जबकि मुस्लिम शिक्षा धार्मिक शिक्षा केंद्रित थी। वैदिक शिक्षा में गुरु-शिष्य संबंध अधिक महत्वपूर्ण थे, जबकि मुस्लिम शिक्षा में संस्थागत शिक्षण व्यवस्था का विकास हुआ।
अंततः कहा जा सकता है कि वैदिक तथा मुस्लिम शिक्षा प्रणालियों ने भारतीय शिक्षा को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों प्रणालियों की विशेषताएँ आज भी शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणास्रोत मानी जाती हैं।
2 . प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण से क्या तात्पर्य है? इसके मार्ग में क्या बाधाएँ हैं? इन बाधाओं को दूर करने के लिए क्या उपाय करने चाहिए?
प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण का अर्थ है कि प्रत्येक बालक और बालिका को बिना किसी भेदभाव के निःशुल्क, अनिवार्य तथा समान प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराई जाए। इसका उद्देश्य 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को विद्यालय से जोड़ना तथा उन्हें शिक्षा के समान अवसर प्रदान करना है। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
भारत में प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के मार्ग में अनेक बाधाएँ उपस्थित हैं। गरीबी सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि अनेक अभिभावक आर्थिक कठिनाइयों के कारण बच्चों को विद्यालय भेजने के बजाय कार्य में लगा देते हैं। अशिक्षा तथा सामाजिक रूढ़ियाँ भी शिक्षा के प्रसार में बाधा उत्पन्न करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव तथा शिक्षण सामग्री की अपर्याप्त व्यवस्था जैसी समस्याएँ भी प्रमुख हैं।
बालिका शिक्षा के प्रति उदासीनता, बाल विवाह तथा बाल श्रम जैसी सामाजिक समस्याएँ भी सार्वभौमीकरण में बाधक हैं। विद्यालयों में शौचालय, पेयजल, पुस्तकालय तथा बैठने की उचित व्यवस्था का अभाव विद्यार्थियों को विद्यालय छोड़ने के लिए विवश करता है। कई बार शिक्षा की गुणवत्ता निम्न होने के कारण भी विद्यार्थी पढ़ाई में रुचि नहीं लेते और बीच में ही विद्यालय छोड़ देते हैं।
इन बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार तथा समाज दोनों को संयुक्त रूप से प्रयास करना चाहिए। प्रत्येक क्षेत्र में पर्याप्त विद्यालयों की स्थापना तथा योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति आवश्यक है। गरीब विद्यार्थियों को निःशुल्क पुस्तकें, वर्दी, छात्रवृत्ति तथा मध्याह्न भोजन जैसी सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए, जिससे वे नियमित रूप से विद्यालय जा सकें।
बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएँ चलानी चाहिए तथा अभिभावकों में जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिए। बाल श्रम और बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर कठोर नियंत्रण आवश्यक है। शिक्षा को रोचक, व्यावहारिक और बालक-केंद्रित बनाया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़े। आधुनिक तकनीक और डिजिटल साधनों का उपयोग भी शिक्षा को अधिक प्रभावी बना सकता है।
अंततः कहा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण राष्ट्र के विकास की आधारशिला है। यदि सरकार, शिक्षक, अभिभावक तथा समाज मिलकर कार्य करें, तो प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार प्राप्त कराया जा सकता है और देश को प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ाया जा सकता है।
OR
“हमारी शिक्षा व्यवस्था में माध्यमिक शिक्षा सबसे निर्बल कड़ी है” विवेचना कीजिए तथा माध्यमिक शिक्षा में पाठ्यक्रम के व्यावसायीकरण की आवश्यकता के लिए सुझाव दीजिए।
माध्यमिक शिक्षा शिक्षा व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण स्तर है, क्योंकि यह प्राथमिक और उच्च शिक्षा के बीच सेतु का कार्य करती है। इसी स्तर पर विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, रुचियों तथा भविष्य की दिशा का विकास होता है। फिर भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था में माध्यमिक शिक्षा को सबसे निर्बल कड़ी कहा जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान माध्यमिक शिक्षा विद्यार्थियों को न तो पूर्ण रूप से रोजगार योग्य बना पाती है और न ही जीवनोपयोगी व्यावहारिक ज्ञान प्रदान कर पाती है।
माध्यमिक शिक्षा अत्यधिक सैद्धांतिक तथा परीक्षा-केंद्रित बन गई है। विद्यार्थी केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने और प्रमाणपत्र प्राप्त करने तक सीमित रह जाते हैं। पाठ्यक्रम में व्यावहारिक तथा तकनीकी शिक्षा का अभाव होने के कारण विद्यार्थियों में कौशल विकास नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे बेरोजगारी की समस्या का सामना करते हैं।
विद्यालयों में प्रयोगशालाओं, कार्यशालाओं तथा तकनीकी संसाधनों की कमी भी माध्यमिक शिक्षा को कमजोर बनाती है। शिक्षण पद्धति में रचनात्मकता तथा नवाचार का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में योग्य शिक्षकों तथा आधारभूत सुविधाओं की कमी के कारण शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। वर्तमान पाठ्यक्रम विद्यार्थियों की रुचियों, स्थानीय आवश्यकताओं तथा उद्योगों की मांगों के अनुरूप नहीं है। इसी कारण माध्यमिक शिक्षा को शिक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी माना जाता है।
इन समस्याओं के समाधान के लिए माध्यमिक शिक्षा में पाठ्यक्रम के व्यावसायीकरण की आवश्यकता अनुभव की जाती है। व्यावसायीकरण का अर्थ है शिक्षा को रोजगारोन्मुख तथा कौशल आधारित बनाना। इससे विद्यार्थी पढ़ाई के साथ-साथ किसी व्यवसाय, तकनीकी कार्य या उद्योग से संबंधित प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे।
व्यावसायिक शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए विद्यालयों में कृषि, कंप्यूटर शिक्षा, हस्तशिल्प, लघु उद्योग, तकनीकी प्रशिक्षण तथा व्यवसाय से संबंधित विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। विद्यार्थियों के लिए कार्यानुभव तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे वे व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर सकें। विद्यालयों में प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों तथा तकनीकी उपकरणों की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए।
शिक्षकों को भी व्यावसायिक शिक्षा का विशेष प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है। पाठ्यक्रम को स्थानीय आवश्यकताओं तथा रोजगार के अवसरों के अनुसार तैयार किया जाना चाहिए। सरकार को व्यावसायिक शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता तथा रोजगार से जुड़ी योजनाओं को बढ़ावा देना चाहिए।
अंततः कहा जा सकता है कि माध्यमिक शिक्षा को प्रभावी, उपयोगी तथा रोजगारोन्मुख बनाने के लिए पाठ्यक्रम का व्यावसायीकरण अत्यंत आवश्यक है। इससे विद्यार्थियों में आत्मनिर्भरता, कार्यकुशलता तथा रोजगार क्षमता का विकास होगा और देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास को नई दिशा प्राप्त होगी।
3 . वुड का आदेश-पत्र भारतीय शिक्षा का “महाधिकार-पत्र” कहा जाता है। समीक्षा कीजिए तथा मैकॉले के विवरण-पत्र के गुण तथा दोषों का वर्णन कीजिए।
वुड का आदेश-पत्र 1854 ई. में सर चार्ल्स वुड द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इसे भारतीय शिक्षा का “महाधिकार-पत्र” कहा जाता है, क्योंकि इसने भारत में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की सुदृढ़ नींव रखी। इस आदेश-पत्र ने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधारों का मार्ग प्रशस्त किया तथा शिक्षा के विकास के लिए स्पष्ट नीतियाँ निर्धारित कीं।
वुड के आदेश-पत्र में शिक्षा के प्रसार के लिए प्रत्येक प्रांत में शिक्षा विभाग स्थापित करने की व्यवस्था की गई। प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के विकास पर विशेष बल दिया गया। विश्वविद्यालयों की स्थापना का सुझाव दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप कलकत्ता, मद्रास और बंबई विश्वविद्यालय स्थापित हुए। इस आदेश-पत्र में स्त्री शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा तथा शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के विकास को भी महत्व दिया गया। मातृभाषा को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने तथा अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम स्वीकार करने की नीति अपनाई गई। अनुदान सहायता प्रणाली के माध्यम से निजी शिक्षण संस्थाओं को भी प्रोत्साहन दिया गया।
वुड के आदेश-पत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने भारतीय शिक्षा को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। इसके कारण शिक्षा का विस्तार हुआ तथा आधुनिक शिक्षा प्रणाली का विकास संभव हुआ। इसलिए इसे भारतीय शिक्षा का “महाधिकार-पत्र” कहा जाता है।
इसके साथ ही मैकॉले का विवरण-पत्र 1835 ई. में प्रस्तुत किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार करना था। मैकॉले का मानना था कि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीयों को पश्चिमी ज्ञान और विज्ञान से परिचित कराया जा सकता है।
मैकॉले के विवरण-पत्र के कुछ गुण भी थे। इसने भारत में आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा, विज्ञान तथा अंग्रेजी साहित्य के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीयों को आधुनिक विचारों, लोकतंत्र तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ज्ञान प्राप्त हुआ। इस नीति के कारण भारत में शिक्षित मध्यम वर्ग का विकास हुआ, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
किन्तु इसके अनेक दोष भी थे। मैकॉले ने भारतीय भाषाओं तथा भारतीय संस्कृति की उपेक्षा की। उसने भारतीय शिक्षा और साहित्य को निम्न स्तर का माना, जिससे भारतीय परंपराओं को आघात पहुँचा। उसकी शिक्षा नीति केवल उच्च वर्ग तक सीमित रही और जनसाधारण की शिक्षा की उपेक्षा हुई। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा के कारण भारतीय समाज में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।
अंततः कहा जा सकता है कि वुड का आदेश-पत्र भारतीय शिक्षा के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ, जबकि मैकॉले के विवरण-पत्र ने आधुनिक शिक्षा का मार्ग तो प्रशस्त किया, परन्तु भारतीय भाषाओं और संस्कृति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
OR
उच्च शिक्षा से आप क्या समझते हैं? उच्च शिक्षा के विकास से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं तथा समाधानों की व्याख्या कीजिए।
उच्च शिक्षा से तात्पर्य उस शिक्षा से है जो माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा के पश्चात महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रदान की जाती है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को विशेष ज्ञान, व्यावसायिक दक्षता, अनुसंधान क्षमता तथा नेतृत्व गुणों से विकसित करना है। उच्च शिक्षा किसी राष्ट्र के बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक विकास की आधारशिला मानी जाती है। इसके माध्यम से योग्य शिक्षक, वैज्ञानिक, चिकित्सक, अभियंता तथा प्रशासनिक अधिकारी तैयार होते हैं, जो राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत में उच्च शिक्षा के विकास के बावजूद अनेक समस्याएँ विद्यमान हैं। पहली प्रमुख समस्या शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में योग्य शिक्षकों, आधुनिक प्रयोगशालाओं तथा पुस्तकालयों की कमी पाई जाती है। दूसरी समस्या बढ़ती हुई बेरोजगारी है। वर्तमान उच्च शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों को रोजगारोन्मुख कौशल प्रदान करने में पूर्णतः सफल नहीं हो पाई है।
आर्थिक संसाधनों की कमी भी उच्च शिक्षा के विकास में बाधा उत्पन्न करती है। ग्रामीण तथा पिछड़े क्षेत्रों में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या कम होने के कारण अनेक विद्यार्थियों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है। अनुसंधान कार्यों में रुचि तथा सुविधाओं का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। राजनीतिक हस्तक्षेप, छात्र अनुशासनहीनता तथा परीक्षा प्रणाली की कमजोरियाँ भी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा के पर्याप्त अवसरों का अभाव भी गंभीर समस्या है। कई बार पाठ्यक्रम पुराने और अप्रासंगिक हो जाते हैं, जिससे विद्यार्थी आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाते। शिक्षा में असमानता तथा निजीकरण के कारण भी गरीब वर्ग के विद्यार्थियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
इन समस्याओं के समाधान के लिए अनेक प्रभावी कदम उठाने आवश्यक हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में योग्य एवं प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए। आधुनिक तकनीक, डिजिटल शिक्षा तथा शोध कार्यों को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। पाठ्यक्रम को समयानुकूल तथा रोजगारोन्मुख बनाया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों में व्यावहारिक कौशल विकसित हो सके।
सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में अधिक आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए तथा ग्रामीण क्षेत्रों में नए महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्थापित करने चाहिए। अनुसंधान तथा नवाचार को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएँ लागू की जानी चाहिए। शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप को कम कर अनुशासन एवं गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
अंततः कहा जा सकता है कि उच्च शिक्षा राष्ट्र के विकास का महत्वपूर्ण साधन है। यदि इसकी समस्याओं का उचित समाधान किया जाए, तो उच्च शिक्षा देश को वैज्ञानिक, आर्थिक तथा सामाजिक प्रगति की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
Section-B
4. (i) “जनपदीय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान” के क्या कार्य हैं?
जनपदीय शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) का मुख्य कार्य प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर के शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करना है। यह संस्थान शिक्षकों की शिक्षण क्षमता तथा व्यावसायिक दक्षता का विकास करता है। DIET शैक्षिक अनुसंधान, पाठ्यक्रम विकास तथा नवीन शिक्षण विधियों के प्रचार-प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने हेतु कार्यशालाओं, संगोष्ठियों तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करता है। इसके अतिरिक्त यह सर्व शिक्षा अभियान तथा अन्य शैक्षिक योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में सहायता प्रदान करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के विकास तथा शिक्षकों को आधुनिक शिक्षण तकनीकों से परिचित कराने में DIET की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(ii) मुदालियर कमीशन द्वारा दिये गये चार सुझावों को लिखिए।
मुदालियर आयोग का गठन 1952 में माध्यमिक शिक्षा सुधार के लिए किया गया था। इस आयोग ने अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए। पहला, माध्यमिक शिक्षा को व्यावसायिक एवं रोजगारोन्मुख बनाया जाए। दूसरा, विद्यार्थियों की रुचि एवं योग्यता के अनुसार विविध पाठ्यक्रमों की व्यवस्था की जाए। तीसरा, पाठ्यक्रम में सह-शैक्षिक गतिविधियों, शारीरिक शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा को महत्व दिया जाए। चौथा, शिक्षण विधियों तथा परीक्षा प्रणाली में सुधार कर व्यावहारिक एवं वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन को बढ़ावा दिया जाए। आयोग ने अनुशासन, नेतृत्व क्षमता तथा नागरिकता की भावना के विकास पर भी बल दिया। इन सुझावों का उद्देश्य माध्यमिक शिक्षा को अधिक उपयोगी, प्रभावी तथा समाजोपयोगी बनाना था।
(iii) आर.टी.ई. 2009 से आप क्या समझते हैं? संक्षेप में लिखिए।
आर.टी.ई. 2009 अर्थात् “शिक्षा का अधिकार अधिनियम” भारत सरकार द्वारा 2009 में लागू किया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। इसके अंतर्गत 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया। इस अधिनियम का उद्देश्य प्रत्येक बच्चे को समान शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना तथा बाल श्रम एवं अशिक्षा को कम करना है। इसके अनुसार किसी भी बच्चे को आर्थिक या सामाजिक कारणों से शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। विद्यालयों में आवश्यक सुविधाएँ, योग्य शिक्षक तथा बालक-केंद्रित शिक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करने पर भी बल दिया गया है। यह अधिनियम शिक्षा के सार्वभौमीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
(iv) कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना के विषय में लिखिए।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना भारत सरकार द्वारा वर्ष 2004 में प्रारम्भ की गई एक महत्त्वपूर्ण योजना है। इसका उद्देश्य सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की बालिकाओं को शिक्षा के अवसर प्रदान करना है। इस योजना के अंतर्गत विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक समुदाय की बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालय स्थापित किए जाते हैं। इन विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 तक की बालिकाओं को निःशुल्क शिक्षा, भोजन, आवास, पुस्तकें तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। योजना का मुख्य लक्ष्य बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना, विद्यालय छोड़ने की समस्या को कम करना तथा महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करना है। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है।
(v) प्राथमिक शिक्षा में ‘अवरोधन’ की समस्या को संक्षेप में लिखिए।
प्राथमिक शिक्षा में ‘अवरोधन’ का अर्थ है कि विद्यार्थी एक ही कक्षा में बार-बार असफल होकर रुक जाते हैं और अगली कक्षा में प्रवेश नहीं कर पाते। यह समस्या शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है तथा विद्यार्थियों में निराशा उत्पन्न करती है। गरीबी, अभिभावकों की अशिक्षा, शिक्षकों की कमी, अनुपयुक्त शिक्षण विधियाँ तथा विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं का अभाव इसके प्रमुख कारण हैं। कई बार विद्यार्थियों की पढ़ाई में रुचि कम होने से भी अवरोधन की समस्या उत्पन्न होती है। इस समस्या को दूर करने के लिए बालक-केंद्रित शिक्षण, योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, आधुनिक शिक्षण विधियों तथा विद्यालयों में उचित सुविधाओं की व्यवस्था आवश्यक है।
(vi) विश्वविद्यालय स्वायत्तता के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
विश्वविद्यालय स्वायत्तता का अर्थ है कि विश्वविद्यालय को अपने शैक्षिक, प्रशासनिक तथा वित्तीय कार्यों में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त हो। इसके प्रमुख प्रकारों में शैक्षणिक स्वायत्तता, प्रशासनिक स्वायत्तता तथा वित्तीय स्वायत्तता शामिल हैं। शैक्षणिक स्वायत्तता के अंतर्गत विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम निर्माण, परीक्षा प्रणाली, शोध कार्य तथा शिक्षण विधियों से संबंधित निर्णय स्वयं लेता है। प्रशासनिक स्वायत्तता के अंतर्गत नियुक्ति, प्रबंधन तथा प्रशासनिक नीतियों का निर्धारण स्वतंत्र रूप से किया जाता है। वित्तीय स्वायत्तता के अंतर्गत विश्वविद्यालय अपने बजट, आय-व्यय तथा संसाधनों के उपयोग से संबंधित निर्णय ले सकता है। इन स्वायत्तताओं का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता, नवाचार तथा प्रभावशीलता को बढ़ावा देना है।
vii) मध्याह्न भोजन योजना के चार उद्देश्य बताइये।
मध्याह्न भोजन योजना भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है, जिसका उद्देश्य विद्यालयों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है। इसका पहला उद्देश्य विद्यार्थियों में कुपोषण को दूर करना तथा उनके स्वास्थ्य में सुधार लाना है। दूसरा उद्देश्य विद्यालयों में नामांकन तथा उपस्थिति बढ़ाना है। तीसरा उद्देश्य विद्यालय छोड़ने की समस्या को कम करना तथा शिक्षा के प्रति रुचि उत्पन्न करना है। चौथा उद्देश्य सामाजिक समानता की भावना विकसित करना है, जिससे सभी वर्गों के बच्चे साथ बैठकर भोजन कर सकें। यह योजना विशेष रूप से गरीब एवं ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के शैक्षिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
(viii) वर्धा शिक्षा योजना के विषय में बताइये।
वर्धा शिक्षा योजना को बुनियादी शिक्षा योजना या नई तालीम भी कहा जाता है। इसका प्रस्ताव महात्मा गांधी द्वारा 1937 में वर्धा सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को श्रम, स्वावलंबन तथा जीवनोपयोगी कार्यों से जोड़ना था। इसके अंतर्गत 7 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा देने पर बल दिया गया। हस्तकला, कुटीर उद्योग तथा उत्पादक कार्यों को शिक्षा का आधार माना गया, ताकि विद्यार्थी व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर सकें। मातृभाषा को शिक्षण का माध्यम बनाया गया तथा नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक विकास पर विशेष बल दिया गया। यह योजना विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
Section-C
5. (i) सेवा-पूर्व और सेवाकालीन अध्यापक शिक्षा के मध्य अन्तर स्पष्ट कीजिए।
सेवा-पूर्व अध्यापक शिक्षा शिक्षण कार्य प्रारम्भ करने से पहले दी जाती है, जबकि सेवाकालीन शिक्षा नौकरी के दौरान शिक्षकों की दक्षता बढ़ाने हेतु प्रदान की जाती है। पहली प्रशिक्षणात्मक होती है, जबकि दूसरी कौशल विकास एवं अद्यतन ज्ञान पर आधारित होती है।
(ii) त्रिभाषा सूत्र क्या है?
त्रिभाषा सूत्र के अनुसार विद्यार्थियों को तीन भाषाओं का अध्ययन कराया जाता है—मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, हिंदी तथा अंग्रेजी। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, भाषाई समन्वय तथा विद्यार्थियों में बहुभाषीय क्षमता का विकास करना है।
(iii) नवोदय विद्यालय का क्या अर्थ है?
नवोदय विद्यालय केंद्र सरकार द्वारा स्थापित आवासीय विद्यालय हैं, जिनका उद्देश्य ग्रामीण प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। यहाँ आधुनिक शिक्षा के साथ अनुशासन, संस्कृति तथा राष्ट्रीय एकता पर विशेष बल दिया जाता है।
(iv) दूरगामी शिक्षा के विभिन्न साधन क्या हैं?
दूरगामी शिक्षा के प्रमुख साधनों में रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, ऑनलाइन कक्षाएँ, पत्राचार पाठ्यक्रम, मोबाइल शिक्षा तथा अध्ययन सामग्री शामिल हैं। इन साधनों के माध्यम से विद्यार्थी घर बैठे शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।
(v) एन.सी.ई.आर.टी. तथा यू.जी.सी. के पूरे नाम लिखिए।
N.C.E.R.T. का पूरा नाम “National Council of Educational Research and Training” अर्थात् राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् है।
U.G.C. का पूरा नाम “University Grants Commission” अर्थात् विश्वविद्यालय अनुदान आयोग है।
(vi) वैदिक तथा उत्तर वैदिक शिक्षा में अन्तर कीजिए।
वैदिक शिक्षा में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा पर बल दिया जाता था, जबकि उत्तर वैदिक शिक्षा में दर्शन, राजनीति, चिकित्सा तथा अन्य लौकिक विषयों का भी विकास हुआ। वैदिक शिक्षा सरल थी, जबकि उत्तर वैदिक शिक्षा अधिक विस्तृत एवं व्यवस्थित बन गई।
(vii) अधोगामी सिद्धान्त के विषय में लिखिये।
अधोगामी सिद्धान्त लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा नीति से संबंधित था। इसके अनुसार पहले उच्च वर्ग को अंग्रेजी शिक्षा दी जाए और वही शिक्षित वर्ग समाज के निम्न वर्गों तक शिक्षा एवं ज्ञान का प्रसार करे। इसे Downward Filtration Theory कहा जाता है।
(viii) कार्य अनुभव से आप क्या समझते हैं?
कार्य अनुभव से तात्पर्य ऐसी शिक्षा से है जिसमें विद्यार्थियों को व्यावहारिक कार्यों एवं श्रम के माध्यम से सीखने का अवसर दिया जाता है। इसका उद्देश्य कार्यकुशलता, आत्मनिर्भरता तथा श्रम के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना है।
(ix) भारत में बौद्धकाल में चार प्रमुख शिक्षा-केन्द्रों के नाम बताइये।
भारत में बौद्धकाल के चार प्रमुख शिक्षा-केन्द्र नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला तथा वल्लभी थे। ये केंद्र शिक्षा, दर्शन, चिकित्सा तथा बौद्ध धर्म के अध्ययन के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध थे।
(x) बालिकाओं की शिक्षा की समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
बालिकाओं की शिक्षा में गरीबी, सामाजिक रूढ़ियाँ, बाल विवाह, विद्यालयों की कमी तथा सुरक्षा संबंधी समस्याएँ प्रमुख बाधाएँ हैं। अभिभावकों की अशिक्षा तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आवश्यक सुविधाओं का अभाव भी बालिका शिक्षा को प्रभावित करता है।