Solved Question Paper of E 301 – 2024
Section – A
1 . समावेशी शिक्षा और पुनर्वास के लिए नीतियों और विधानों का वर्णन कीजिए।
समावेशी शिक्षा एवं एकीकृत शिक्षा में विस्तारपूर्वक अन्तर कीजिए।
समावेशी शिक्षा की सफलता काफी हद तक शिक्षक की दक्षता, संवेदनशीलता तथा प्रशिक्षण पर निर्भर करती है। समावेशी शिक्षक को सामान्य तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ प्रभावी ढंग से कार्य करना होता है। इसलिए उनके लिए ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए जो उन्हें विविध शिक्षण परिस्थितियों से निपटने में सक्षम बना सकें।
सबसे पहले, शिक्षकों को समावेशी शिक्षा की अवधारणा, उद्देश्य तथा सिद्धांतों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। उन्हें विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं, अधिगम असमर्थताओं तथा बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के बारे में जानकारी प्रदान की जानी चाहिए। इससे शिक्षक प्रत्येक बालक की समस्या को समझकर उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग कर सकेगा।
प्रशिक्षण कार्यक्रमों में बालक-केंद्रित एवं लचीली शिक्षण विधियों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। शिक्षकों को सहयोगात्मक अधिगम, समूह शिक्षण, उपचारात्मक शिक्षण तथा व्यक्तिगत शिक्षण योजनाओं के निर्माण का प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है। इसके साथ ही सहायक उपकरणों, ब्रेल लिपि, सांकेतिक भाषा तथा आधुनिक तकनीकी साधनों के उपयोग की जानकारी भी दी जानी चाहिए।
समावेशी शिक्षक के लिए परामर्श एवं मार्गदर्शन संबंधी प्रशिक्षण भी महत्वपूर्ण है। शिक्षक को बच्चों की भावनात्मक, सामाजिक एवं व्यवहारिक समस्याओं को समझने तथा उनका समाधान करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त अभिभावकों, विशेष शिक्षकों एवं समुदाय के साथ समन्वय स्थापित करने का प्रशिक्षण भी आवश्यक है।
प्रशिक्षण कार्यक्रमों में कार्यशालाएँ, सेमिनार, व्यावहारिक अभ्यास तथा विद्यालय आधारित प्रशिक्षण शामिल होने चाहिए। समय-समय पर पुनः प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर शिक्षकों को नवीन शिक्षण तकनीकों एवं नीतियों से अवगत कराया जाना चाहिए।
अन्ततः, समावेशी शिक्षक के लिए प्रभावी प्रशिक्षण कार्यक्रम आवश्यक हैं, क्योंकि इनके माध्यम से शिक्षक में संवेदनशीलता, कौशल एवं आत्मविश्वास का विकास होता है, जो समावेशी शिक्षा को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
3 . भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 की विस्तृत विवेचना कीजिए।
भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 (Rehabilitation Council of India Act, 1992) भारत सरकार द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण अधिनियम है, जिसका उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों के पुनर्वास एवं विशेष शिक्षा से संबंधित सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है। इस अधिनियम के अंतर्गत भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) को वैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।
इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य पुनर्वास एवं विशेष शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले पेशेवरों के प्रशिक्षण, पंजीकरण तथा मान्यता की व्यवस्था करना है। परिषद यह सुनिश्चित करती है कि केवल प्रशिक्षित एवं योग्य व्यक्ति ही पुनर्वास सेवाओं में कार्य करें। इसके लिए RCI विशेष शिक्षकों, पुनर्वास कार्यकर्ताओं, परामर्शदाताओं तथा अन्य विशेषज्ञों का पंजीकरण करती है।
भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम के अंतर्गत प्रशिक्षण संस्थानों एवं पाठ्यक्रमों को मान्यता प्रदान की जाती है। परिषद समय-समय पर इन पाठ्यक्रमों की समीक्षा करती है तथा प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए निरीक्षण भी करती है। यदि कोई संस्था निर्धारित मानकों का पालन नहीं करती, तो उसकी मान्यता समाप्त की जा सकती है।
यह अधिनियम समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके माध्यम से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। साथ ही दिव्यांग व्यक्तियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षण एवं पुनर्वास सेवाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।
RCI अधिनियम दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में सहायक है। यह अधिनियम पुनर्वास सेवाओं में व्यावसायिक नैतिकता एवं गुणवत्ता बनाए रखने पर बल देता है। इसके अतिरिक्त परिषद विभिन्न कार्यशालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं शोध कार्यों को भी प्रोत्साहित करती है।
अन्ततः, भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 दिव्यांग व्यक्तियों के शैक्षिक एवं सामाजिक विकास हेतु एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अधिनियम प्रशिक्षित विशेषज्ञों की व्यवस्था करके समावेशी शिक्षा एवं पुनर्वास सेवाओं को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
OR
समावेशी शिक्षा को सुगम बनाने में शिक्षक-प्रशिक्षकों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
Section – B
4 . समावेशी शिक्षा हेतु शिक्षण रणनीतियों का वर्णन कीजिए।
समावेशी शिक्षा में बालक-केंद्रित, सहयोगात्मक तथा लचीली शिक्षण रणनीतियों का प्रयोग किया जाता है। इसमें समूह अधिगम, व्यक्तिगत शिक्षण, सहायक सामग्री एवं आधुनिक तकनीकी साधनों द्वारा सभी विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है।