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CCSU B.Ed 2nd Year Solved Question Papers DEMO

Solved Question Paper of E 301 – 2024

 

Section – A

1 . समावेशी शिक्षा और पुनर्वास के लिए नीतियों और विधानों का वर्णन कीजिए।

समावेशी शिक्षा और पुनर्वास का उद्देश्य प्रत्येक बालक, विशेषकर दिव्यांग एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को समान शैक्षिक अवसर प्रदान करना तथा उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ना है। भारत सरकार ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेक नीतियाँ एवं विधानों का निर्माण किया है।

समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 तथा संशोधित कार्यक्रम 1992 ने सभी बच्चों के लिए समान शिक्षा पर बल दिया। इसके बाद सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के अंतर्गत दिव्यांग बच्चों को सामान्य विद्यालयों में शिक्षा देने की व्यवस्था की गई। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (RTE Act) ने 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित की। यह अधिनियम भेदभाव रहित शिक्षा पर विशेष बल देता है।

दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा हेतु दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 (RPWD Act) लागू किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत दिव्यांग व्यक्तियों को शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा के अधिकार प्रदान किए गए। इसके अतिरिक्त विद्यालयों एवं सार्वजनिक स्थानों को सुगम बनाने की व्यवस्था भी की गई।

पुनर्वास के क्षेत्र में भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम 1992 (RCI Act) अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य पुनर्वास एवं विशेष शिक्षा से जुड़े पेशेवरों के प्रशिक्षण एवं गुणवत्ता को सुनिश्चित करना है। यह अधिनियम विशेष शिक्षकों एवं पुनर्वास कार्यकर्ताओं को मान्यता प्रदान करता है।इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय ट्रस्ट अधिनियम 1999 ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता तथा बहुविकलांगता वाले व्यक्तियों के संरक्षण एवं पुनर्वास हेतु बनाया गया। सरकार द्वारा छात्रवृत्ति, सहायक उपकरण, विशेष विद्यालय तथा समावेशी विद्यालयों की स्थापना जैसे अनेक कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।अन्ततः, समावेशी शिक्षा और पुनर्वास से संबंधित नीतियाँ एवं विधान समानता, सामाजिक न्याय तथा मानवाधिकारों को बढ़ावा देते हैं और दिव्यांग व्यक्तियों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदान करते हैं।

OR

समावेशी शिक्षा एवं एकीकृत शिक्षा में विस्तारपूर्वक अन्तर कीजिए।

समावेशी शिक्षा एवं एकीकृत शिक्षा दोनों का उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करना है, किन्तु इनके दृष्टिकोण, व्यवस्था तथा कार्यप्रणाली में अंतर पाया जाता है। एकीकृत शिक्षा में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य विद्यालयों में प्रवेश तो दिया जाता है, परन्तु उन्हें विद्यालय की सामान्य व्यवस्था के अनुसार स्वयं को ढालना पड़ता है। इसके विपरीत समावेशी शिक्षा में विद्यालय एवं शिक्षण व्यवस्था को बच्चों की आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूल बनाया जाता है।एकीकृत शिक्षा का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों को सामान्य बच्चों के साथ पढ़ने का अवसर देना है, जबकि समावेशी शिक्षा का उद्देश्य सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है। समावेशी शिक्षा में प्रत्येक बालक की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, रुचियों तथा क्षमताओं का ध्यान रखा जाता है।एकीकृत शिक्षा में विशेष बच्चों के लिए अलग से विशेष शिक्षक या विशेष कक्षाओं की व्यवस्था की जाती है। इसमें सामान्य शिक्षक की भूमिका सीमित होती है। दूसरी ओर, समावेशी शिक्षा में सामान्य शिक्षक, विशेष शिक्षक, अभिभावक तथा समुदाय सभी मिलकर सहयोगात्मक रूप से कार्य करते हैं। यहाँ बालक-केंद्रित एवं लचीली शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाता है।एकीकृत शिक्षा में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य वातावरण में समायोजित करने का प्रयास किया जाता है, जबकि समावेशी शिक्षा में विद्यालय का वातावरण सभी बच्चों के लिए अनुकूल बनाया जाता है। समावेशी शिक्षा सामाजिक समानता, सहयोग, सहानुभूति तथा लोकतांत्रिक मूल्यों को अधिक बढ़ावा देती है।एकीकृत शिक्षा की तुलना में समावेशी शिक्षा अधिक व्यापक एवं आधुनिक अवधारणा मानी जाती है। इसमें रैम्प, ब्रेल पुस्तकें, सहायक उपकरण, परामर्श सेवाएँ तथा व्यक्तिगत शिक्षण योजनाओं जैसी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।अन्ततः, समावेशी शिक्षा और एकीकृत शिक्षा दोनों ही विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं, किन्तु समावेशी शिक्षा अधिक मानवीय, समानतापूर्ण एवं प्रभावशाली शिक्षा व्यवस्था मानी जाती है, जो प्रत्येक बालक को सम्मानपूर्वक सीखने का अवसर प्रदान करती है।

पिछड़े बालक वे बालक होते हैं जिनकी शैक्षिक उपलब्धि उनकी आयु, कक्षा या सामान्य स्तर की अपेक्षा कम होती है। ऐसे बालक सामान्य बच्चों की तुलना में सीखने की गति में धीमे होते हैं तथा अध्ययन कार्यों को समझने में अधिक समय लेते हैं। पिछड़ापन शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक कारणों से उत्पन्न हो सकता है। इन बच्चों को उचित मार्गदर्शन एवं विशेष शिक्षण सहायता की आवश्यकता होती है।

पिछड़े बालकों की अनेक विशेषताएँ होती हैं। ये बालक पढ़ाई में रुचि कम लेते हैं तथा बार-बार असफलता का सामना करते हैं। उनकी स्मरण शक्ति एवं एकाग्रता सामान्य बच्चों की अपेक्षा कमजोर हो सकती है। ऐसे बालक कक्षा में निष्क्रिय रहते हैं और आत्मविश्वास की कमी अनुभव करते हैं। कई बार वे सामाजिक समायोजन में कठिनाई महसूस करते हैं तथा हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। इनकी सीखने की गति धीमी होती है और इन्हें बार-बार अभ्यास एवं पुनरावृत्ति की आवश्यकता पड़ती है।

पिछड़े बालकों के लिए विभिन्न शैक्षिक प्रावधान किए जाते हैं। सबसे पहले उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं एवं समस्याओं की पहचान की जाती है। शिक्षण प्रक्रिया को सरल, रुचिकर एवं बालक-केंद्रित बनाया जाता है। ऐसे बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान, अतिरिक्त समय तथा विशेष मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है। पुनरावृत्ति, अभ्यास कार्य तथा सहायक शिक्षण सामग्री का उपयोग उनके अधिगम को प्रभावी बनाता है।

विद्यालयों में परामर्श सेवाएँ, उपचारात्मक शिक्षण तथा सहयोगात्मक अधिगम की व्यवस्था भी की जाती है। अभिभावकों एवं शिक्षकों के बीच समन्वय स्थापित कर बच्चों के विकास पर ध्यान दिया जाता है। इनके आत्मविश्वास को बढ़ाने हेतु प्रोत्साहन एवं प्रेरणा प्रदान की जाती है।

अन्ततः, पिछड़े बालकों को उचित शिक्षा, मार्गदर्शन एवं सहयोग देकर उनकी क्षमताओं का विकास किया जा सकता है। सही शैक्षिक प्रावधान उन्हें आत्मनिर्भर एवं समाजोपयोगी नागरिक बनाने में सहायक सिद्ध होते हैं।

OR

समावेशी शिक्षा की सफलता काफी हद तक शिक्षक की दक्षता, संवेदनशीलता तथा प्रशिक्षण पर निर्भर करती है। समावेशी शिक्षक को सामान्य तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ प्रभावी ढंग से कार्य करना होता है। इसलिए उनके लिए ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए जो उन्हें विविध शिक्षण परिस्थितियों से निपटने में सक्षम बना सकें।

सबसे पहले, शिक्षकों को समावेशी शिक्षा की अवधारणा, उद्देश्य तथा सिद्धांतों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। उन्हें विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं, अधिगम असमर्थताओं तथा बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के बारे में जानकारी प्रदान की जानी चाहिए। इससे शिक्षक प्रत्येक बालक की समस्या को समझकर उचित शिक्षण विधियों का प्रयोग कर सकेगा।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों में बालक-केंद्रित एवं लचीली शिक्षण विधियों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। शिक्षकों को सहयोगात्मक अधिगम, समूह शिक्षण, उपचारात्मक शिक्षण तथा व्यक्तिगत शिक्षण योजनाओं के निर्माण का प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है। इसके साथ ही सहायक उपकरणों, ब्रेल लिपि, सांकेतिक भाषा तथा आधुनिक तकनीकी साधनों के उपयोग की जानकारी भी दी जानी चाहिए।

समावेशी शिक्षक के लिए परामर्श एवं मार्गदर्शन संबंधी प्रशिक्षण भी महत्वपूर्ण है। शिक्षक को बच्चों की भावनात्मक, सामाजिक एवं व्यवहारिक समस्याओं को समझने तथा उनका समाधान करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त अभिभावकों, विशेष शिक्षकों एवं समुदाय के साथ समन्वय स्थापित करने का प्रशिक्षण भी आवश्यक है।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों में कार्यशालाएँ, सेमिनार, व्यावहारिक अभ्यास तथा विद्यालय आधारित प्रशिक्षण शामिल होने चाहिए। समय-समय पर पुनः प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर शिक्षकों को नवीन शिक्षण तकनीकों एवं नीतियों से अवगत कराया जाना चाहिए।

अन्ततः, समावेशी शिक्षक के लिए प्रभावी प्रशिक्षण कार्यक्रम आवश्यक हैं, क्योंकि इनके माध्यम से शिक्षक में संवेदनशीलता, कौशल एवं आत्मविश्वास का विकास होता है, जो समावेशी शिक्षा को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

3 . भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 की विस्तृत विवेचना कीजिए।

भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 (Rehabilitation Council of India Act, 1992) भारत सरकार द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण अधिनियम है, जिसका उद्देश्य दिव्यांग व्यक्तियों के पुनर्वास एवं विशेष शिक्षा से संबंधित सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है। इस अधिनियम के अंतर्गत भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) को वैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।

इस अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य पुनर्वास एवं विशेष शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले पेशेवरों के प्रशिक्षण, पंजीकरण तथा मान्यता की व्यवस्था करना है। परिषद यह सुनिश्चित करती है कि केवल प्रशिक्षित एवं योग्य व्यक्ति ही पुनर्वास सेवाओं में कार्य करें। इसके लिए RCI विशेष शिक्षकों, पुनर्वास कार्यकर्ताओं, परामर्शदाताओं तथा अन्य विशेषज्ञों का पंजीकरण करती है।

भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम के अंतर्गत प्रशिक्षण संस्थानों एवं पाठ्यक्रमों को मान्यता प्रदान की जाती है। परिषद समय-समय पर इन पाठ्यक्रमों की समीक्षा करती है तथा प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए निरीक्षण भी करती है। यदि कोई संस्था निर्धारित मानकों का पालन नहीं करती, तो उसकी मान्यता समाप्त की जा सकती है।

यह अधिनियम समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके माध्यम से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। साथ ही दिव्यांग व्यक्तियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षण एवं पुनर्वास सेवाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है।

RCI अधिनियम दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में सहायक है। यह अधिनियम पुनर्वास सेवाओं में व्यावसायिक नैतिकता एवं गुणवत्ता बनाए रखने पर बल देता है। इसके अतिरिक्त परिषद विभिन्न कार्यशालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं शोध कार्यों को भी प्रोत्साहित करती है।

अन्ततः, भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 दिव्यांग व्यक्तियों के शैक्षिक एवं सामाजिक विकास हेतु एक महत्वपूर्ण कदम है। यह अधिनियम प्रशिक्षित विशेषज्ञों की व्यवस्था करके समावेशी शिक्षा एवं पुनर्वास सेवाओं को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

OR

समावेशी शिक्षा को सुगम बनाने में शिक्षक-प्रशिक्षकों की भूमिका की चर्चा कीजिए।

समावेशी शिक्षा का उद्देश्य सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के समान शिक्षा प्रदान करना है। इस व्यवस्था को सफल बनाने में शिक्षक-प्रशिक्षकों की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। शिक्षक-प्रशिक्षक ऐसे शिक्षकों को तैयार करते हैं जो सामान्य तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की आवश्यकताओं को समझकर प्रभावी शिक्षण कार्य कर सकें।

शिक्षक-प्रशिक्षक सबसे पहले शिक्षकों में समावेशी शिक्षा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एवं संवेदनशीलता का विकास करते हैं। वे शिक्षकों को यह समझाते हैं कि प्रत्येक बालक अलग होता है और सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। इसके माध्यम से शिक्षकों में सहयोग, सहानुभूति तथा मानवता की भावना विकसित होती है।

समावेशी शिक्षा को सुगम बनाने के लिए शिक्षक-प्रशिक्षक विभिन्न शिक्षण विधियों एवं रणनीतियों का प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। वे शिक्षकों को बालक-केंद्रित शिक्षण, सहयोगात्मक अधिगम, उपचारात्मक शिक्षण तथा व्यक्तिगत शिक्षण योजनाओं के निर्माण की जानकारी देते हैं। इसके अतिरिक्त ब्रेल लिपि, सांकेतिक भाषा, सहायक उपकरणों एवं आधुनिक तकनीकी साधनों के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

शिक्षक-प्रशिक्षक शिक्षकों को विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं एवं अधिगम असमर्थताओं की पहचान करने तथा उनके समाधान के उपायों से भी अवगत कराते हैं। वे कक्षा प्रबंधन, परामर्श एवं मार्गदर्शन संबंधी कौशल विकसित करने में सहायता करते हैं, जिससे शिक्षक समावेशी वातावरण बना सकें।

इसके अतिरिक्त शिक्षक-प्रशिक्षक कार्यशालाओं, संगोष्ठियों एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षकों को नवीन नीतियों, विधानों एवं शिक्षण तकनीकों की जानकारी प्रदान करते हैं। वे शिक्षकों, अभिभावकों तथा समुदाय के बीच समन्वय स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अन्ततः, शिक्षक-प्रशिक्षक समावेशी शिक्षा की सफलता के आधार स्तंभ हैं। उनके प्रभावी प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन से शिक्षक सभी बच्चों के लिए समान, सहायक एवं प्रेरणादायक शिक्षण वातावरण तैयार कर पाते हैं।

 

Section – B

4 . समावेशी शिक्षा हेतु शिक्षण रणनीतियों का वर्णन कीजिए।

समावेशी शिक्षा में बालक-केंद्रित, सहयोगात्मक तथा लचीली शिक्षण रणनीतियों का प्रयोग किया जाता है। इसमें समूह अधिगम, व्यक्तिगत शिक्षण, सहायक सामग्री एवं आधुनिक तकनीकी साधनों द्वारा सभी विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है।

5 . सीखने की अक्षमता वाले बच्चों के निदान और उपचार का वर्णन कीजिए।

सीखने की अक्षमता वाले बच्चों के निदान हेतु उनकी पढ़ने, लिखने, बोलने एवं गणना संबंधी कठिनाइयों का परीक्षण किया जाता है। उपचार में उपचारात्मक शिक्षण, व्यक्तिगत ध्यान, विशेष अभ्यास, परामर्श तथा सहायक शिक्षण सामग्री का उपयोग किया जाता है।

6 . ओपन डिजिटल शिक्षा संसाधनों के बारे में समझाइए।

ओपन डिजिटल शिक्षा संसाधन ऐसे ऑनलाइन शैक्षिक सामग्री एवं साधन हैं, जिन्हें विद्यार्थी और शिक्षक निःशुल्क उपयोग, संशोधन तथा साझा कर सकते हैं। इनमें ई-पुस्तकें, वीडियो, ऑनलाइन पाठ्यक्रम एवं डिजिटल नोट्स शामिल होते हैं।

7 . सहकारी अधिगम से आप क्या समझते हैं?

सहकारी अधिगम वह शिक्षण प्रक्रिया है जिसमें विद्यार्थी समूह बनाकर सहयोगपूर्वक सीखते हैं। इसमें परस्पर सहभागिता, विचार-विनिमय तथा सामूहिक प्रयास द्वारा ज्ञान एवं कौशल का विकास किया जाता है।

8 . ई-अधिगम से आप क्या समझते हैं?

ई-अधिगम वह शिक्षण प्रक्रिया है जिसमें कंप्यूटर, इंटरनेट एवं डिजिटल तकनीकों के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाती है। यह शिक्षार्थियों को कहीं भी और कभी भी सीखने की सुविधा उपलब्ध कराता है।

9 . समावेशी कक्षा प्रबंधन से आपका क्या अभिप्राय है?

समावेशी कक्षा प्रबंधन वह प्रक्रिया है जिसमें सभी विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर समान, सहयोगात्मक एवं सकारात्मक शिक्षण वातावरण तैयार किया जाता है, ताकि प्रत्येक बालक प्रभावी रूप से सीख सके।

10.भारत में समावेशी शिक्षा को बढ़ाने के लिए अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम का वर्णन कीजिए।

भारत में समावेशी शिक्षा हेतु अध्यापक शिक्षा कार्यक्रमों के अंतर्गत शिक्षकों को विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान, समावेशी शिक्षण विधियाँ, सहायक उपकरणों तथा कक्षा प्रबंधन का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।

 

11.लचीले पाठ्यक्रम की विशेषताएँ लिखिए।

लचीला पाठ्यक्रम बालक-केंद्रित होता है तथा विद्यार्थियों की रुचि, क्षमता एवं आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तनशील होता है। इसमें विविध शिक्षण विधियाँ, गतिविधियाँ, व्यक्तिगत अधिगम तथा व्यावहारिक अनुभवों को महत्व दिया जाता है।

Section – C

 

1.निम्नलिखित में से कौन-सा बच्चों का समूह समावेशी शिक्षा के अन्तर्गत आता है :

(i) सामान्य विद्यार्थी
(ii) विशिष्ट विद्यार्थी
(iii) सामान्य एवं विशिष्ट विद्यार्थी✅
(iv) उपरोक्त में से कोई नहीं

 

2.मन्द बुद्धि बालक की बुद्धिलब्धि है :

(i) 50-60✅
(ii) 100-110
(iii) 0-24
(iv) 10-30

 

3.एन.आई.वी.एच. उन बच्चों से सम्बन्धित है, जो हैं :

(i) बहरे
(ii) दृष्टिबाधित✅
(iii) शारीरिक रूप से विकलांग
(iv) धीमी गति से सीखने वाला

 

4.आर.सी.आई. की फुल फॉर्म क्या है?

(i) भारतीय पुनर्वास परिषद✅
(ii) भारतीय पुनर्वास समिति
(iii) भारतीय प्रतिवेदन परिषद
(iv) भारतीय प्रतिवेदन समिति

 

5.समावेशी शिक्षा के संस्थापक कौन थे?

(i) डिक्रॉली✅
(ii) डेविस
(iii) ब्लूम
(iv) नरेन्द्र देव

 

6.दा स्कूल एण्ड सोसाइटी पुस्तक के लेखक जॉन ड्यूवी थे। (सत्य/असत्य)

सत्य ✅

 

7.मोटर कौशल में सीखने की अक्षमता डिस्प्रेक्सिया कहलाती है। (सत्य/असत्य)

सत्य ✅

 

8.शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2011 में शुरू हुआ था। (सत्य/असत्य)

असत्य ✅

 

9.बुद्धि-लब्धि का प्रत्यय स्टर्न द्वारा दिया गया। (सत्य/असत्य)

सत्य ✅

 

10.एन.सी.ई.आर.टी. की फुल फॉर्म लिखिए।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद

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